भक्ति और वैराग्य: मानव जीवन के दो परम कल्याणकारी स्तंभ हरिद्वार

हरिद्वार वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोज मनोज मनोजानंद पावन धरा, भूपतवाला स्थित प्रसिद्ध गंगा इंटरनेशनल में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा दादा नागरमल जी एवं दादा श्री रामधारी मल एवं समस्त पितरों की पुण्य स्मृति में उनके तर्पण हेतु पावन स्मृति के अवसर पर परम पूज्य धीरज कृष्ण शास्त्री जी महाराज ने एक अत्यंत मार्मिक और शाश्वत सत्य की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है। महाराज जी के अनुसार, जब तक मनुष्य के मन में भक्ति और वैराग्य एक साथ धारण नहीं हो जाते, तब तक भक्ति पूर्ण रूप से सफल नहीं होती। आइए, महाराज जी के इस दिव्य संदेश के प्रकाश में भक्ति और वैराग्य के इस गहरे संबंध को समझें और अपने जीवन को ईश्वर-रंग में सराबोर करें। भक्ति क्या है? ईश्वर से अनन्य प्रेम का नाम है भक्ति भक्ति का अर्थ केवल सुबह-शाम दीपक जलाना या मंत्रों का जाप करना मात्र नहीं है। भक्ति तो आत्मा का परमात्मा से ऐसा अनन्य और निश्छल प्रेम है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई दूरी नहीं रह जाती। जब हृदय में ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास, समर्पण और प्रेम का उदय होता है, तो वह अवस्था भक्ति कहलाती है। श्रीमद् भागवत महापुराण के अनुसार, भक्ति ही वह सुगम मार्ग है जो जीव को सीधे गोलोक धाम या प्रभु के चरणों से जोड़ता है। वैराग्य क्या है? संसार के प्रति अनासक्ति का भाव आमतौर पर लोग वैराग्य का अर्थ घर-बार छोड़ना, परिवार का त्याग करना या जंगलों में चले जाना समझते हैं। परंतु महाराज जी के कथनानुसार, सच्चा वैराग्य मन का एक भाव है। संसार की नश्वर वस्तुओं, वासनाओं, मोह और अहंकार के प्रति आसक्ति का समाप्त हो जाना ही वैराग्य है। वैराग्य का अर्थ यह नहीं कि आप संसार में न रहें, बल्कि इसका अर्थ यह है कि संसार आपके भीतर न रहे। जैसे कीचड़ में रहकर भी कमल का फूल निर्लिप्त रहता है, वैसे ही संसार में रहकर प्रभु में लीन रहना ही सच्चा वैराग्य है। भक्ति और वैराग्य: एक सिक्के के दो पहलू श्रीमद् भागवत कथा के महात्म्य में वर्णन आता है कि भक्ति देवी के दो पुत्र हैं—’ज्ञान’ और ‘वैराग्य’। माँ (भक्ति) के बिना पुत्र अधूरे हैं और पुत्रों के बिना माँ अधूरी है। यदि हमारे भीतर वैराग्य नहीं होगा, तो हमारा मन बार-बार संसार के भौतिक सुखों, ईर्ष्या, द्वेष और माया में भटकेगा।
जब मन संसार में भटकेगा, तो वह ईश्वर में पूरी तरह एकाग्र नहीं हो पाएगा। इसलिए, जब तक जीवन में वैराग्य का उदय नहीं होता, तब तक भक्ति स्थिर और सफल नहीं हो सकती। वैराग्य मन के विकारों के कचरे को साफ करता है और भक्ति उस स्वच्छ मन में प्रभु का आसन स्थापित करती है। वैराग्य के बिना भक्ति अधूरी क्यों? यदि कोई व्यक्ति दिन-रात भगवान का नाम लेता है, लेकिन उसके मन में अभी भी धन, संपत्ति, क्रोध और दूसरों के प्रति ईर्ष्या की भावना बनी हुई है, तो उसकी भक्ति केवल एक दिखावा मात्र रह जाती है। ऐसी भक्ति का फल नहीं मिलता। महाराज जी ने बिल्कुल सत्य कहा है कि भक्ति को सफल बनाने के लिए वैराग्य का होना अनिवार्य है। जब मन को यह बोध हो जाता है कि यह संसार क्षणभंगुर है और केवल नारायण ही शाश्वत सत्य हैं, तब भक्ति में गहराई आती है और वह सिद्ध होती है। व्यावहारिक जीवन में भक्ति और वैराग्य का समावेश कैसे करें? परम पूज्य धीरज कृष्ण शास्त्री जी महाराज के इस उपदेश को हम अपने दैनिक जीवन में निम्नलिखित तरीकों से उतार सकते हैं: कर्तव्य का पालन करें, मोह का नहीं: परिवार और समाज के प्रति अपनी सभी जिम्मेदारियों को निभाएं, लेकिन यह याद रखें कि सब कुछ ईश्वर का है, मेरा कुछ नहीं। संतुष्टि का भाव: जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है—इस भाव के साथ जीवन जिएं। लोभ और तृष्णा से दूरी ही वैराग्य की शुरुआत है। निरंतर नाम सिमरन: अपने दिनचर्या के कार्यों को करते हुए भी मन ही मन प्रभु के नाम का जप करते रहें, जिससे हृदय निर्मल बना रहे। प्रभु चरणों में परम विश्राम हरिद्वार में माँ गंगा के सानिध्य में बह रही इस कथा रसधारा का यही निचोड़ है कि यदि हम सचमुच ईश्वर की कृपा का अनुभव करना चाहते हैं, तो हमें अपने भीतर भक्ति और वैराग्य दोनों को एक साथ पोषित करना होगा। भक्ति हमें प्रभु के प्रेम में रोना सिखाती है और वैराग्य हमें संसार के दुखों पर हंसना सिखाता है। जिस दिन ये दोनों हमारे जीवन में उतर आएंगे, उसी दिन हमारी भक्ति सफल हो जाएगी और हमारा जीवन धन्य हो जाएगा। “परम पूज्य धीरज कृष्ण शास्त्री जी महाराज के चरणों में कोटि-कोटि नमन, जिन्होंने हमें भक्ति और वैराग्य का यह अनुपम मार्ग दिखाया।”इस अवसर पर गर्ग परिवार से श्री निरंजन दास जी एवं उनके सभी भाई बच्चे परिवारजन इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से पधारे हुए



