श्रीकृष्ण धाम आश्रम में गूंजा रुक्मिणी विवाह का दिव्य मंगलगान, भक्तिरस में झूम उठे श्रद्धालु हरिद्वार

हरिद्वार वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानंद खड़खड़ी स्थित श्रीकृष्ण धाम आश्रम में प्रातः स्मरणीय परम पूज्य कथा व्यास श्री धर्मेश भाई शास्त्री जी के श्रीमुख से प्रवाहित हो रही श्रीमद्भागवत कथा के दौरान आज रुक्मिणी विवाह का अत्यंत पावन, भावपूर्ण एवं मनोहारी प्रसंग सुनाया गया। विश्व प्रसिद्ध तीर्थनगरी हरिद्वार की पावन धरा तथा मां गंगा के पवित्र तट पर कथा श्रवण कर श्रद्धालु अपने मानव जीवन को धन्य एवं सफल बना रहे हैं।कथा व्यास श्री धर्मेश भाई शास्त्री जी ने अत्यंत मधुर वाणी में भगवान श्रीकृष्ण एवं माता रुक्मिणी के दिव्य मिलन का वर्णन करते हुए कहा कि जहां सच्ची श्रद्धा, अटूट विश्वास और निष्काम प्रेम होता है, वहां स्वयं प्रभु अपने भक्त की पुकार सुनकर चले आते हैं। उन्होंने कहा कि रुक्मिणी जी का श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण प्रत्येक भक्त के लिए आदर्श है।कथा के दौरान उन्होंने बड़े ही भावपूर्ण स्वर में कहा “रुक्मिणी लिखे पाती, सुनो द्वारिकाधीश।आकर हर लो प्राणनाथ, मिट जाए जग की पीर॥”इस भजन को सुनते ही कथा पंडाल भक्तिरस से सराबोर हो उठा। श्रद्धालु “राधे-श्याम” और “जय श्रीकृष्ण” के जयघोष करते हुए भक्ति में झूमने लगे। कोई हाथ उठाकर नृत्य करने लगा तो कोई भावविभोर होकर प्रभु की महिमा का गुणगान करने लगा। संपूर्ण आश्रम का वातावरण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं द्वारिका नगरी पृथ्वी पर उतर आई हो।कथा व्यास श्री धर्मेश भाई शास्त्री जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा मनुष्य जीवन को सन्मार्ग की ओर ले जाने वाली दिव्य ज्योति है। जिस जीवन में भगवान का नाम, सत्संग और भक्ति आ जाती है, उसका जीवन स्वतः ही पवित्र और सार्थक बन जाता है। उन्होंने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा— “नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च। मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद॥” अर्थात भगवान स्वयं कहते हैं कि मैं केवल वैकुण्ठ में ही निवास नहीं करता, बल्कि जहां मेरे भक्त प्रेमपूर्वक मेरा गुणगान करते हैं, वहीं मैं साक्षात उपस्थित रहता हूं। उन्होंने आगे कहा कि हरिद्वार की यह पावन धरा और मां गंगा का तट अनादिकाल से ऋषि-मुनियों, संतों एवं भक्तों की तपस्थली रही है। यहां कथा श्रवण करने मात्र से मनुष्य के अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में आध्यात्मिक चेतना का उदय होता है।रुक्मिणी विवाह की झांकी के दौरान श्रद्धालु भक्ति रस में इस प्रकार डूब गए कि पूरा कथा परिसर मृदंग, झांझ, करताल और हरिनाम संकीर्तन से गुंजायमान हो उठा। भक्तजन नाचते, गाते और झूमते हुए भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गुणगान करते रहे। कई श्रद्धालुओं की आंखें प्रेम और आनंद के अश्रुओं से भर उठीं। अंत में आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ कथा का समापन हुआ। उपस्थित श्रद्धालुओं ने कथा को अपने जीवन के लिए अत्यंत प्रेरणादायी एवं आत्मा को परम शांति प्रदान करने वाला बताया।

Related Articles

Back to top button