श्रीमद्भागवत कथा महायज्ञ का भक्तिमय वातावरण में हुआ भव्य समापन, श्रद्धालुओं ने ग्रहण किया भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का अमृत हरिद्वार


हरिद्वार वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजनंद। जगजीतपुर स्थित श्री नरेशानंद गिरि आश्रम में विगत कई दिनों से चल रहे श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान महायज्ञ का समापन अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ संपन्न हुआ। समापन अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण कर अपने जीवन को धन्य बनाया तथा भगवान की दिव्य लीलाओं का रसास्वादन किया। संपूर्ण आश्रम परिसर हरिनाम संकीर्तन, भजन-कीर्तन और जयघोषों से गुंजायमान रहा। कथा व्यास परम श्रद्धेय श्री संजय कृष्ण महाराज ने अपने ओजस्वी एवं भावपूर्ण प्रवचनों में श्रीमद्भागवत की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भगवान के साक्षात स्वरूप का दिव्य प्रकाश है। जहां भागवत कथा होती है, वहां स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों के मध्य विराजमान रहते हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य संसार में अनेक प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त कर सकता है, किंतु यदि उसके जीवन में भगवान का स्मरण और भक्ति नहीं है तो वह भीतर से अधूरा ही रहता है। एक मार्मिक दृष्टांत सुनाते हुए महाराज श्री ने कहा कि एक व्यक्ति जीवन भर धन-संपत्ति एकत्रित करने में लगा रहा, किंतु अंत समय में उसे यह अनुभव हुआ कि उसके साथ कुछ भी नहीं जा सकता। दूसरी ओर एक साधारण भक्त जिसने अपना जीवन प्रभु नाम, सेवा और सत्संग में लगाया, वह मृत्यु के समय भी प्रसन्न और निश्चिंत था। इस दृष्टांत के माध्यम से उन्होंने बताया कि वास्तविक संपत्ति भगवान का नाम, सत्कर्म और भक्ति है, जो इस लोक और परलोक दोनों में मनुष्य का साथ देती है। उन्होंने ध्रुव, प्रह्लाद, सुदामा और गोपियों की भक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान को न धन प्रिय है, न वैभव; उन्हें केवल निष्कपट प्रेम और समर्पण चाहिए। भक्त जब सच्चे मन से प्रभु का स्मरण करता है, तब भगवान स्वयं उसके जीवन की नौका के खेवैया बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य तनाव, असंतोष और भटकाव से घिरा हुआ है, जिसका एकमात्र समाधान भगवान की शरण और सत्संग है। कथा व्यास ने कहा कि श्रीमद्भागवत का संदेश मानवता, करुणा, प्रेम और सेवा है। जो व्यक्ति दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझकर सेवा करता है, वही सच्चे अर्थों में भगवान का भक्त कहलाने योग्य है। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से अपने जीवन में धर्म, संस्कार और सदाचार को अपनाने का आह्वान किया। इस अवसर पर सद्गुरुदेव स्वामी शांतानंद जी महाराज की पतित-पावन कृपा संपूर्ण आयोजन पर विशेष रूप से अनुभूत होती रही। श्रद्धालुओं ने कहा कि गुरुदेव की दिव्य प्रेरणा और आशीष से ही यह कथा महायज्ञ भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का विराट संगम बन सका। स्वामी शांतानंद जी महाराज के सान्निध में आश्रम निरंतर धर्म, सेवा, संस्कार और मानव कल्याण के कार्यों को आगे बढ़ा रहा है। समापन अवसर पर सद्गुरुदेव के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए वक्ताओं ने कहा कि गुरु ही वह प्रकाश हैं जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर जीवन को ईश्वर की ओर अग्रसर करते हैं। गुरु कृपा से ही कथा का वास्तविक फल प्राप्त होता है और मनुष्य के भीतर आत्मिक जागरण का दीप प्रज्ज्वलित होता है। कथा के समापन पर विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। श्रद्धालुओं की आंखों में कथा की मधुर स्मृतियां और हृदय में भगवान के प्रति भक्ति का भाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था। पूरा वातावरण “राधे-राधे”, “जय श्रीकृष्ण” तथा “सद्गुरुदेव महाराज की जय” के जयघोषों से गुंजायमान रहा। श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान महायज्ञ का यह पावन आयोजन श्रद्धालुओं के हृदय में भक्ति, प्रेम, सेवा और आध्यात्मिक जागरण का अमिट संदेश छोड़ गया तथा मानव जीवन को प्रभु भक्ति के माध्यम से सार्थक बनाने की प्रेरणा प्रदान कर गया।




