ईश्वर और प्रकृति ही मानव जीवन का मूल आधार महंत कमलेशानंद सरस्वती
हरि भजन और गुरु का पावन सानिध्य जीवन में आत्मिक सुख के साथ देता है कल्याण सुधा रस

हरिद्वार, वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानंद। खड़खड़ी स्थित श्री गंगा भक्ति आश्रम के परमाध्यक्ष प्रातः स्मरणीय गुरु भगवान श्री महंत कमलेशानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि ईश्वर और प्रकृति ही मानव जीवन का वास्तविक मोल हैं तथा ईश्वर की आराधना जीवन कल्याण का सुधा रस है। मनुष्य जीवन में चाहे कितनी भी भौतिक उन्नति कर ले, लेकिन ईश्वर और प्रकृति के बिना उसका अस्तित्व संभव नहीं है।उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य के शरीर में अन्न का एक कण और प्राणवायु के रूप में सांस विद्यमान है, तभी तक यह शरीर सुरक्षित और जीवंत रहता है। अन्न समाप्त हो जाए तो शरीर की जीवन-यात्रा रुक जाती है और यदि सांसों का साथ छूट जाए तो कुछ ही समय में यह शरीर नश्वर होकर प्रकृति में विलीन होने लगता है। उन्होंने कहा कि यह संसार की सबसे बड़ी सच्चाई है कि जिस शरीर के लिए मनुष्य पूरी जिंदगी संघर्ष करता है, उसके न रहने पर अपने लोग भी उसे शीघ्र अंतिम संस्कार के लिए ले जाने की बात करते हैं।
महंत कमलेशानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि अन्न, जल और वायु—तीनों प्रकृति के अमूल्य उपहार हैं। अन्न के बिना शरीर नहीं, जल के बिना जीवन नहीं और प्राणवायु के बिना सांसों का अस्तित्व नहीं। इन सभी के पीछे ईश्वर की अदृश्य सत्ता और प्रकृति की महान शक्ति कार्य करती है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य चाहे विज्ञान के क्षेत्र में कितनी भी तरक्की कर ले और कितने ही नए आविष्कार क्यों न कर ले, लेकिन ईश्वर और प्रकृति की शक्ति के सामने उसकी उपलब्धियां भी सीमित हैं। इसलिए मानव जीवन का उद्देश्य केवल सुख-सुविधाएं अर्जित करना नहीं, बल्कि ईश्वर का स्मरण, हरि भजन, भक्ति और गुरु का पावन सानिध्य प्राप्त करना होना चाहिए।उन्होंने कहा कि विज्ञान और आविष्कार मनुष्य को भौतिक सुख-साधन दे सकते हैं, लेकिन हरि भजन और ईश्वर की आराधना ही आत्मिक सुख प्रदान करती है। गुरु के सानिध्य में रहकर किया गया भजन और सत्संग मनुष्य को जीवन की वास्तविकता का बोध कराता है तथा उसे जीवन कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाता है।उन्होंने श्रद्धालु भक्तों से आह्वान किया कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रहें, अन्न और जल का सम्मान करें, प्राणवायु की महत्ता को समझें और अपने जीवन को ईश्वर भक्ति, सत्संग तथा सद्कर्मों में लगाएं। यही मानव जीवन की सच्ची सार्थकता और जीवन कल्याण का सुधा रस है।


