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गुरु भक्ति और संत सेवा से प्रशस्त होता है ईश्वर प्राप्ति का मार्ग : महामंडलेश्वर स्वामी प्रणव चैतन्य पुरी हरिद्वार

हरिद्वार, वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोज मनोजानंद। धर्मनगरी हरिद्वार के हरिपुर स्थित परमार्थ साधक संघ में परमार्थ साधक संघ के संस्थापक आचार्य ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी विष्णु पुरी जी महाराज की पतित पावन स्मृति में विशाल संत समागम एवं संत भंडारे का आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ किया गया। कार्यक्रम का आयोजन परमार्थ साधक संघ के अध्यक्ष परम पूज्य आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी प्रणव चैतन्य पुरी जी महाराज के पावन सानिध्य में हुआ। इस अवसर पर संत-महापुरुषों ने ब्रह्मलीन गुरु भगवान को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके तप, त्याग, साधना, गुरु भक्ति और धर्म सेवा से प्रेरित जीवन का स्मरण किया। संत समागम में उपस्थित संतों ने कहा कि महापुरुष अपनी देह त्यागने के बाद भी अपने ज्ञान, संस्कारों और आध्यात्मिक विचारों के माध्यम से सदैव समाज का मार्गदर्शन करते रहते हैं। उनके द्वारा दिखाया गया धर्म, सेवा और सदाचार का मार्ग पीढ़ियों तक मानवता को प्रेरणा देता है। इस अवसर पर परमार्थ साधक संघ के अध्यक्ष परम पूज्य आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी प्रणव चैतन्य पुरी जी महाराज ने कहा कि गुरु केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि शिष्य के जीवन को अज्ञान के अंधकार से निकालकर आत्मज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाले दिव्य पथप्रदर्शक होते हैं। गुरु की कृपा से ही मनुष्य के भीतर विवेक, विनम्रता, करुणा और ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा का संचार होता है। ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी विष्णु पुरी जी महाराज ने अपने जीवन में धर्म, अध्यात्म और परमार्थ की जिस पवित्र परंपरा को आगे बढ़ाया, वह सदैव साधक समाज का मार्गदर्शन करती रहेगी। उनकी स्मृति में आयोजित संत समागम केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में धारण करने का संकल्प भी है। स्वामी प्रणव चैतन्य पुरी जी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म की महानता उसकी गुरु-शिष्य परंपरा, संत सेवा, जीव मात्र के प्रति करुणा और लोककल्याण की भावना में निहित है। जब मनुष्य अपने जीवन को गुरु के बताए मार्ग पर समर्पित कर देता है, तब उसके भीतर अहंकार का क्षय और भक्ति का उदय होने लगता है। सच्ची गुरु भक्ति वही है, जिसमें गुरु के उपदेशों को सुनने के साथ-साथ उन्हें अपने आचरण में भी उतारा जाए। संत सेवा, प्रभु स्मरण और परोपकार के माध्यम से ही मानव जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है। इस अवसर पर महामंडलेश्वर स्वामी हरि चेतनानंद जी महाराज ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि संत-महापुरुष समाज के आध्यात्मिक प्रकाश स्तंभ हैं। उनका संपूर्ण जीवन मानवता को धर्म, प्रेम, सद्भाव और ईश्वर भक्ति का संदेश देता है। ब्रह्मलीन संतों की पुण्य स्मृति में आयोजित होने वाले संत समागम समाज को अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जोड़ते हैं और आने वाली पीढ़ियों को सनातन संस्कृति के संस्कार प्रदान करते हैं। गुरु के प्रति श्रद्धा और संतों के प्रति सम्मान ही भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की अमूल्य धरोहर है। महामंडलेश्वर स्वामी ललितानंद जी महाराज ने कहा कि गुरु का सानिध्य मनुष्य के जीवन में नई चेतना का संचार करता है। संसार में धन, वैभव और प्रतिष्ठा क्षणभंगुर हैं, लेकिन गुरु से प्राप्त ज्ञान और प्रभु के प्रति समर्पण जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। जो व्यक्ति गुरु के वचनों को अपने जीवन का आधार बनाता है, वह विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म और सत्य के मार्ग से विचलित नहीं होता। ब्रह्मलीन स्वामी विष्णु पुरी जी महाराज की स्मृति में आयोजित यह संत समागम गुरु महिमा और सनातन धर्म की दिव्य परंपरा को आगे बढ़ाने वाला पुनीत आयोजन है। महामंडलेश्वर स्वामी अभयानंद जी महाराज ने कहा कि भक्ति मनुष्य के हृदय को निर्मल बनाकर उसे प्रभु के समीप ले जाती है। जब जीवन में गुरु के प्रति अटूट विश्वास और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण होता है, तब मनुष्य के भीतर सेवा और परोपकार की भावना स्वतः जागृत होने लगती है। संतों का जीवन हमें सिखाता है कि वास्तविक महानता दूसरों के कल्याण में निहित है। गुरु भगवान के आदर्शों का अनुसरण करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। पूज्य स्वामी चैतन्य पुरी जी महाराज ने कहा कि गुरु की महिमा शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। गुरु वह दिव्य शक्ति हैं, जो साधक को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मचिंतन और परमात्मा की अनुभूति की ओर प्रेरित करते हैं। गुरु कृपा से ही भक्ति में दृढ़ता आती है और साधना को सही दिशा मिलती है। प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में गुरु के प्रति श्रद्धा रखते हुए सत्य, प्रेम, करुणा और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए। भोला गिरी के महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी तेजसानन्द जी महाराज ने कहा कि संत भंडारा भारतीय सनातन संस्कृति में सेवा, समर्पण और समानता का प्रतीक है। संतों की सेवा और उन्हें श्रद्धापूर्वक भोजन कराना केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष और पुण्य का माध्यम भी है। जब किसी आयोजन का उद्देश्य ब्रह्मलीन गुरु के प्रति श्रद्धा प्रकट करना और संत समाज की सेवा करना होता है, तब वह आयोजन आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। गुरु की स्मृति में किए गए सेवा कार्य समाज में सद्भाव और धर्म के संस्कारों को मजबूत करते हैं। पूज्य स्वामी अवधेश चैतन्य पुरी जी महाराज ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल सांसारिक सुखों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मकल्याण के साथ-साथ लोककल्याण की भावना को जागृत करना भी है। गुरु के बताए मार्ग पर चलकर मनुष्य अपने जीवन को सेवा, साधना और सदाचार से परिपूर्ण बना सकता है। ब्रह्मलीन संतों का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि शरीर नश्वर है, लेकिन सत्कर्म, सद्ज्ञान और भक्ति से अर्जित आध्यात्मिक विरासत सदैव जीवित रहती है। स्वामी सोहम चैतन्य पुरी जी महाराज ने कहा कि जहां गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा, संतों का सानिध्य और प्रभु के नाम का स्मरण होता है, वहां आध्यात्मिक चेतना का स्वतः जागरण होता है। गुरु भक्ति मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाती है और उसके जीवन में शांति, संतोष तथा सकारात्मकता का संचार करती है। ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी विष्णु पुरी जी महाराज के आदर्शों को आत्मसात करना ही उनके प्रति सच्ची गुरु दक्षिणा है। उनके द्वारा स्थापित परमार्थ की परंपरा सदैव धर्म और अध्यात्म की ज्योति प्रज्वलित करती रहेगी।
संत समागम के दौरान गुरु महिमा, ईश्वर भक्ति, सनातन धर्म की महानता, संत सेवा और मानव कल्याण जैसे विषयों पर आध्यात्मिक विचारों की अमृत वर्षा हुई। उपस्थित श्रद्धालुओं ने संत-महापुरुषों के श्रीमुख से निकले उपदेशों को श्रद्धापूर्वक सुना और गुरु चरणों में अपनी आस्था व्यक्त की। इसके पश्चात संत भंडारे में संत-महात्माओं की सेवा की गई। संपूर्ण आयोजन ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी विष्णु पुरी जी महाराज के प्रति अटूट श्रद्धा, गुरु भक्ति और आध्यात्मिक समर्पण का प्रतीक बना। संतों ने एक स्वर में कहा कि गुरु परंपरा सनातन धर्म की आत्मा है। गुरु भगवान के आदर्शों को जीवन में धारण करना, संतों का सम्मान करना और मानवता की सेवा में अपना योगदान देना ही सच्ची धर्म साधना है। ब्रह्मलीन स्वामी विष्णु पुरी जी महाराज की पावन स्मृति में आयोजित यह संत समागम उनकी आध्यात्मिक विरासत को नमन करने के साथ-साथ समाज को भक्ति, सेवा और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहेगा।
॥ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

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