माँ कामाख्या शक्तिपीठ के दर्शन कर धन्य हुए महंत रविन्द्र पुरी जी महाराज, सनातन संस्कृति की अद्भुत धरोहर है कामाख्या धाम हरिद्वार

हरिद्वार वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोज मनोजानंद। पंचायती श्री निरंजनी अखाड़े के सचिव, मनसा देवी ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष प्रातः स्मरणीय परम पूज्य श्री महंत रविन्द्र पुरी जी महाराज को असम के गुवाहाटी स्थित नीलांचल पर्वत पर विराजमान विश्वविख्यात माँ कामाख्या शक्तिपीठ के दर्शन का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस अवसर पर उन्होंने माँ भगवती के श्रीचरणों में देश, धर्म एवं समस्त मानवता के कल्याण की प्रार्थना की।महंत रविन्द्र पुरी जी महाराज ने कहा कि माँ कामाख्या मंदिर भारतवर्ष के प्रमुख एवं सिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। यह तीर्थ केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि शक्ति उपासना और तांत्रिक साधना का महान आध्यात्मिक धाम भी है। उन्होंने बताया कि इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य और विशेषता यह है कि यहाँ देवी की कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक योनिरूप शिला कीपूजा-अर्चना की जाती है, जिसे आदिशक्ति का साक्षात स्वरूप माना जाता है।उन्होंने पुराणों में वर्णित कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि जब राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती ने अपने पति भगवान शिव के अपमान से आहत होकर योगाग्नि में देह त्याग दी थी, तब शोकाकुल भगवान शिव उनके शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। सृष्टि के संतुलन हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के अंगों को विभाजित किया। जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई। मान्यता है कि नीलांचल पर्वत पर माता सती का योनिभाग गिरा था, जिसके कारण यह स्थान कामाख्या शक्तिपीठ के रूप में विख्यात हुआ। इस अवसर पर महंत रविन्द्र पुरी जी महाराज ने संस्कृत का प्रसिद्ध श्लोक उद्धृत करते हुए कहा— “या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”अर्थात जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति स्वरूप से स्थित हैं, उन भगवती को बारंबार नमस्कार है। उन्होंने कहा कि कामाख्या धाम में प्रतिवर्ष जून माह में आयोजित होने वाला अंबुबाची मेला अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक उत्सव है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन दिनों माँ भगवती रजस्वला होती हैं, जिसके कारण तीन दिनों तक मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। चौथे दिन विशेष पूजा-अर्चना के उपरांत कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोले जाते हैं। इस दौरान देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु, संत-महात्मा एवं साधक माँ के दर्शन हेतु यहाँ पहुँचते हैं।महंत रविन्द्र पुरी जी महाराज ने कहा कि माँ कामाख्या का यह पावन धाम सनातन संस्कृति की अद्भुत आध्यात्मिक विरासत है, जहाँ श्रद्धा, भक्ति, शक्ति और साधना का दिव्य संगम देखने को मिलता है। माँ भगवती की कृपा से भक्तों के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि एवं आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से भारतीय संस्कृति और धर्म परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन का आह्वान भी किया।


