धर्मनगरी में आध्यात्मिक उत्कर्ष: गुरु श्री गोरखनाथ अलख अखाड़े द्वारा सात महामंडलेश्वरों का ऐतिहासिक पट्टाभिषेक हरिद्वार

हरिद्वार वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानंद। माँ गंगा की शीतल लहरों और कनखल की पावन रज में बसा हरिद्वार सदा से ही भारतीय संस्कृति और अध्यात्म का केंद्र रहा है। इसी पावन श्रृंखला में कनखल, माँ आनंदमई रोड स्थित परमार्थ ज्ञान मंदिर प्रतिष्ठित आश्रम में एक ऐसा दिव्य और भव्य कार्यक्रम संपन्न हुआ, जिसने सनातन धर्म की अखाड़ा परंपरा में एक नया स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है। गुरु श्री गोरखनाथ अलख अखाड़े द्वारा सात अत्यंत प्रबुद्ध और विद्वान संतों का ‘महामंडलेश्वर’ पद पर पट्टाभिषेक एवं पारंपरिक ‘चादर विधि’ का भव्य आयोजन किया गया। गुरु सत्ता का सानिध्य और दिव्य मार्गदर्शन यह संपूर्ण अनुष्ठान अखाड़े के अध्यक्ष, प्रातः स्मरणीय, परम वंदनीय गुरु भगवान श्री संजीवन नाथ महाराज के पतित पावन सानिध्य और प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। आध्यात्मिक जगत में गुरु का स्थान सर्वोपरि है, और जब स्वयं एक सिद्ध पुरुष के संरक्षण में किसी संत का अभिषेक होता है, तो वह पद मात्र एक उपाधि न रहकर लोक-कल्याण का एक जीवंत संकल्प बन जाता है। श्री संजीवन नाथ महाराज की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को वह गरिमा और ऊर्जा प्रदान की, जिसकी अनुभूति वहाँ उपस्थित प्रत्येक श्रद्धालु और संत समाज ने की। महामंडलेश्वर पद: गौरव, गरिमा और गुरुतर उत्तरदायित्व
सनातन परंपरा में ‘महामंडलेश्वर’ शब्द का अर्थ अत्यंत गूढ़ है। यह शब्द दो शब्दों के मेल से बना है ‘मण्डल’ और ‘ईश्वर’। इसका अर्थ है उस आध्यात्मिक समूह या मंडली का नेतृत्व करने वाला जो ज्ञान, वैराग्य और सेवा का साक्षात स्वरूप हो। अखाड़ों की व्यवस्था: भारतीय अखाड़ा परिषद और साधु समाज में महामंडलेश्वर को अत्यंत ऊँचा और सम्मानजनक स्थान प्राप्त है। वे अखाड़े की परंपराओं के संरक्षक और धर्म के ध्वजवाहक होते हैं। विद्वता की कसौटी: इस पद पर आसीन होने वाले सात प्रबुद्ध संतों का चयन उनकी शास्त्रों के प्रति निष्ठा, तपस्या और समाज के प्रति उनके समर्पण को देखकर किया गया है। आश्रम और समाज में भूमिका: समाज में जब भी नैतिक मूल्यों का ह्रास होता है, तब ये महामंडलेश्वर ही अपने प्रवचनों और आदर्श जीवन से जनमानस को सही मार्ग दिखाते हैं। भव्य चादर विधि और सांस्कृतिक वैभव
कनखल के आश्रम में आयोजित इस उत्सव का दृश्य किसी देवलोक से कम नहीं था। शंखध्वनि, वैदिक ऋचाओं का पाठ और ‘अलख निरंजन’ के जयघोष ने संपूर्ण वातावरण को भक्तिमय कर दिया। पट्टाभिषेक के दौरान संपन्न हुई ‘चादर विधि’ एक अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण परंपरा है।
जब गुरुओं द्वारा इन संतों को चादर ओढ़ाई गई, तो यह इस बात का प्रतीक था कि अब ये संत अपने व्यक्तिगत जीवन से ऊपर उठकर अखाड़े की मर्यादाओं और सनातन धर्म की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित कर चुके हैं। उपस्थित जनसमूह ने इन दिव्य विभूतियों के दर्शन कर स्वयं को धन्य माना।
धर्म रक्षा का संकल्प
इस भव्य समागम का मुख्य उद्देश्य केवल पदों का वितरण नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में संतों की भागीदारी सुनिश्चित करना था। नव-नियुक्त महामंडलेश्वरों ने गुरु श्री गोरखनाथ अलख अखाड़े की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए समाज में समरसता, ज्ञान की ज्योति और धर्म के वास्तविक स्वरूप को स्थापित करने का संकल्प लिया।
हरिद्वार की इस पावन धरती पर हुआ यह समागम आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा। यह दर्शाता है कि आधुनिकता के इस दौर में भी हमारी प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा और अखाड़ा संस्कृति आज भी उतनी ही जीवंत और प्रभावशाली है। गुरु श्री गोरखनाथ अलख अखाड़े का यह प्रयास सनातन धर्म को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा। श्री संजीवन नाथ महाराज के नेतृत्व में इन सात महामंडलेश्वरों का चयन समाज को एक नई दिशा देने में मील का पत्थर साबित होगा। महामंडलेश्वर साईं मां नाथ महाराज राष्ट्रीय महिला महामंत्री महामंडलेश्वर दीपिका नाथ महाराज महामंडलेश्वर तारानाथ महाराज महामंडलेश्वर ज्ञानेश जी महाराज महामंडलेश्वर आशुतोष नाथ महाराज महामंडलेश्वर भाविका नाथ महाराज महामंडलेश्वर तारानाथ महाराज श्री श्री योगी नंद नाथजी महाराज प्रदेश प्रभारी हरियाणा आदि तपस्वी परम विद्वान ज्ञान मूर्ति संतो की चादर विधि पट्टाभिषेक कार्यक्रम महामंडलेश्वर पद पर बड़े ही धूमधाम हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ इस अवसर पर आचार्य श्री चंद्रभूषणानंद जी महाराज की तिलक चादर विधि भी बड़े ही धूमधाम हर्षोल्लास के साथ संपन्न की गई इस अवसर पर पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर डॉ अनीता योगेश्वरी जी महाराज महामंडलेश्वर प्रेम दास महाराज स्वामी प्रेम चैतन्य महाराज स्वामी अवेधानन्द जी महाराज सहित भारी संख्यामें संत महापुरुष तथा भक्तजन उपस्थित थे

