छल ही छल का देवता छल ही छल का पाप ईश्वर भक्ति से आत्मिक संतोष की अनुभूति होती है श्री महंत श्याम सुंदर महाराज हरिद्वार

हरिद्वार अक्टूबर 2025 (वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानंद )श्री श्याम वैकुंठ धाम श्यामपुर के परमाध्यक्ष प्रातः स्मरणीय श्री महंत श्यामसुंदर महाराज ने कहा इस पृथ्वी पर छल ही छल का देवता और छल ही छल का पाप डर ही डर को पूजता डर कर अपने आप छल से किया गया छल सदैव छल ही बना रहता है अगर वह थोड़ा बहुत छल करने के बाद ईश्वर को पूजता भी है तो उस पूजा में भी उसके डर का छल बना रहता है अगर आप किसी के साथ अन्याय अपराध छल करने के बाद कुछ दान सत्कर्म दया कर भी रहे हैं तो वह डर की वजह से कर रहे हैं तो ऐसा दान सत्कर्म पूजा पाठ किसी काम का नहीं पूजा पाठ और ईश्वर भक्ति तो मनुष्य के मन को आत्मिक संतोष प्रदान कर देता है किंतु अगर कोई यह सोच रहा है की हजार पाप छल करने के बाद कुछ दान सत्कर्म पूजा पाठ करने से वह पाप मुक्त हो जायेगा तो वह संभव है क्योंकि छल करने वाला पाप करने वाला कभी भगवान को हृदय में नहीं बसा सकता वह जो भी करता है डर की वजह से करता है क्योंकि छल ही छल का देवता और छल ही छल का पाप छल ही छल को पूजता डर कर अपने आप वह उसका डर है जो उसे ईश्वर पूजा के लियें डरकर प्रेरित कर रहा है वह पूजा पाठ अपनी अंतरात्मा से नहीं करता उसका डर उसे पूजा पाठ कराता है उसका डर उसे पाप कम करने के लिए दान के लिए प्रेरित करता है किंतु जिसमें आत्मिक संतोष की प्राप्ति नहीं वह पूजा कैसी पूजा भक्ति अनुष्ठान तथा ईश्वर भक्ति मनुष्य को ईश्वर कृपा से ही प्राप्त हो सकती अगर कोई वैसे कर रहा है डर कर कर रहा है तो उसका कोई लाभ नहीं क्योंकि मनुष्य जब निस्वार्थ भाव से दान करता है तो वह अपना पराया नहीं देखता किंतु जो छल से दान कर रहा है अपने पाप कम करने के लिए दान कर रहा है वह दान करने में भी अपना पराया बड़ा छोटा देखा है और खास लोगों का चयन करता है उसके पूजा पाठ में भी उसी की तरह के बनावटी लोग आयेंगे हे कबीरा तेरी झोपड़ी गल कटिया के पास जो करेंगे सो भरेंगे तू क्यों हुआ उदास लेकिन जो निस्वार्थ भाव से दान करता है वह अपना पराया का भेद नहीं देखा छोटा बड़ा नहीं देखता जो आगे हाथ करता है उसे देता चला जाता है यही दान है और जिसमें अपने पराई की पहचान है जो जानकर दान कर रहा है कि यह मेरा है इसे देना है तो वह क्या दान हुआ और क्या सत्कर्म हुआ पूजा पाठ भले ही पल भर का हो किंतु पूरी तरह से एकांतवास में हो और निस्वार्थ हो तो वही कठोर तपस्या के सामान और स्वार्थ वशीभूत होकर आप रात दिन ढपलिया पीटते रहे ढोलकी चिमटे बजाते रहे उनका कोई लाभ नहीं पूजा पाठ और ईश्वर भक्ति पूरी तरह निस्वार्थ होनी चाहिये


