माता मीरा बाई ने कृष्ण की निश्चल भक्ति से संपूर्ण विश्व को बताया है की ईश्वर प्रेम के वशीभूत कैसे हो जाते हैं श्री महंत विष्णु दास महाराज

 हरिद्वार 28 सितंबर 2025 वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानंदश्री गुरु रामसेवक उछाली आश्रम हिमालय डिपो गली श्रवण नाथ नगर हरिद्वार में अपने श्री मुख से उद्गार व्यक्त करते हुए ज्ञान तथा त्याग की अखंण्ड मूर्ति परम तपस्वी विद्वान संत श्री महंत विष्णु दास जी महाराज ने कहा संत परंपरा में कई ऐसे महान भक्त हुए जिन्होंने अपनी अटूट आस्था और समर्पण से भक्ति की परिभाषा को ही बदल दिया। जैसे मीरा ने कृष्ण को प्रेम भक्ति से प्राप्त किया माता राधा ने कृष्ण प्रेम की संपूर्ण संसार के सामने एक अनूठी परंपरा तथा प्रेरणा स्थापित की कृष्ण को संपूर्ण संसार ढूंढ रहा है व श्री कृष्ण राधा राधा राधा राधा राधा कर माता राधा को ढूंढ रहे हैं इसी प्रकार सुदामा जी ने मित्र भाव होने के साथ-साथ भगवान श्री कृष्ण की निश्चल भक्ति कर उन्हें प्राप्त किया माता शबरी ने सबर की सभी सीमाएं पारकी भगवान राम को उन्हें दर्शन देने आना पड़ा इन संतों में मीराबाई का नाम सदैव अग्रगण्य है। मीराबाई का जीवन कृष्ण-प्रेम और उनकी निश्चल भक्ति का अद्वितीय उदाहरण है। उनका हृदय केवल श्रीकृष्ण की छवि में ही रम गया था। वे संसार के हर मोह-माया से ऊपर उठकर केवल अपने प्रियतम श्रीकृष्ण को ही सर्वस्व मानती थीं।

मीराबाई का प्रारंभिक जीवन और कृष्ण से लगाव

मीराबाई का जन्म सन् 1498 ई. में राजस्थान के कुड़की गांव (मेड़ता) में हुआ था। बचपन से ही उनके मन में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अद्भुत आकर्षण था। कहा जाता है कि जब वे छोटी थीं, तब एक साधु उनके घर में श्रीकृष्ण की मूर्ति दे गए। उसी क्षण से मीराबाई ने कृष्ण को अपने पति, मित्र और जीवनसाथी के रूप में स्वीकार कर लिया। यह मूर्ति उनके जीवन का आधार बन गई और उनका हर क्षण इसी आराध्य के नाम अर्पित हो गया।

निश्चल भक्ति का स्वरूप

मीराबाई ने कभी भक्ति को दिखावे या आडंबर का साधन नहीं बनाया। उनकी भक्ति पूर्णत: निश्चल, निर्मल और निष्काम थी। वे केवल कृष्ण के नाम का स्मरण करके ही अपने जीवन को धन्य मानती थीं। चाहे राजमहल की विलासिता हो या संसार के विरोध—मीराबाई का मन कभी अपने प्रियतम कृष्ण से डगमगाया नहीं। वे गीतों और पदों के माध्यम से अपने हृदय की व्यथा और प्रेम व्यक्त करती थीं। उनके भजनों में वह आत्मिक पीड़ा और विरह की तड़प झलकती है जो केवल एक सच्चा भक्त ही अनुभव कर सकता है।

विरोध और पीड़ा के बावजूद अटूट आस्था

मीराबाई का विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से हुआ था, परंतु विवाहोपरांत भी उनका मन केवल कृष्ण में ही लगा रहा। राजपरिवार और समाज ने उनकी इस भक्ति को स्वीकार नहीं किया और उन्हें अनेक यातनाएँ दीं। कभी उन्हें विष का प्याला दिया गया, कभी साँप भरी टोकरी भेजी गई, परंतु हर बार श्रीकृष्ण की कृपा से वे सुरक्षित रहीं। ये घटनाएँ केवल यह प्रमाण हैं कि उनका कृष्ण-प्रेम और भक्ति किसी भी सांसारिक शक्ति से परे थी।

मीराबाई के पद और भक्ति-साहित्य

मीराबाई ने अपने प्रेम और भक्ति को व्यक्त करने के लिए पद-रचना की। उनके पदों में कृष्ण को प्रियतम, पति और जीवनदाता के रूप में चित्रित किया गया है। उनकी पंक्तियों में गहन विरह, प्रेम और समर्पण का अद्भुत संगम है। वे गाती थीं:

“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।”

यह पंक्ति उनके सम्पूर्ण जीवन और भक्ति का सार है—उनके लिए संसार में श्रीकृष्ण के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं था।

मीराबाई की भक्ति का संदेश

मीराबाई का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति वही है जिसमें मनुष्य अपने आराध्य को बिना किसी स्वार्थ और लालसा के प्रेम करता है। भक्ति का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि अपने ईश्वर के प्रति समर्पण और विश्वास है। मीराबाई की निश्चल भक्ति ने यह संदेश दिया कि जब प्रेम सच्चा और आत्मिक हो, तो वह हर कठिनाई और बाधा को पार कर सकता है।

मीराबाई का कृष्ण-प्रेम भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। उनकी निश्चल भक्ति ने उन्हें संतों की श्रेणी में स्थान दिलाया। उनका जीवन यह प्रेरणा देता है कि यदि हमारा मन ईश्वर में स्थिर हो जाए, तो संसार के दुख, बाधाएँ और कष्ट हमें विचलित नहीं कर सकते।

मीराबाई का प्रेम केवल उनका व्यक्तिगत भाव नहीं था, बल्कि समस्त मानवता के लिए एक प्रेरणा है। उनका जीवन आज भी हमें यह सिखाता है कि सच्चा सुख केवल ईश्वर के नाम में ही है। जो सुख भगवान श्री राम भगवान श्री हरि भगवान श्री कृष्णा के सिमरन से प्राप्त होता है वह कहीं और प्राप्त हो ही नहीं सकता

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