जिस हृदय में करुणा तथा विनम्रता का भाव होता है वही भगवान का सच्चा मंदिर है महामंडलेश्वर श्याम दास महाराज हरिद्वार

हरिद्वार वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोज मनोजानंद भूपत वाला सब सरोवर रोड स्थित प्रसिद्ध श्री हनुमान गुफा में भक्त जनों के बीच अपने श्री मुख से उद्गार व्यक्त करते हुए प्रातः स्मरणीय महामंडलेश्वर 1008 श्री श्याम दास जी महाराज ने कहाजिस हृदय में प्रेम का निवास होता है, जहाँ भक्ति की धारा निरंतर प्रवाहित होती है और जहाँ प्रत्येक प्राणी के प्रति सम्मान, करुणा तथा विनम्रता का भाव जागृत रहता है, वही हृदय भगवान का सच्चा मंदिर बन जाता है। प्रभु श्रीराम की कृपा उसी पर बरसती है जिसका अंतःकरण निर्मल, सरल और निष्कलुष हो। प्रेम के बिना भक्ति अधूरी है और भक्ति के बिना भगवान की प्राप्ति दुर्लभ है। जिस प्रकार दीपक बिना ज्योति के केवल पात्र मात्र रह जाता है, उसी प्रकार प्रेम रहित हृदय ईश्वर के अनुभव से वंचित रह जाता है। यदि मनुष्य श्रीराम की अनंत भक्ति को पाना चाहता है तो उसे अपने भीतर प्रेम, संतोष, त्याग और वैराग्य को धारण करना होगा। सांसारिक इच्छाएँ, मोह और माया मन को बाँधकर आत्मा को अशांत कर देते हैं। मोह-माया का यह जाल मनुष्य को सत्य से दूर ले जाता है और उसका मन केवल विषय-वासनाओं में उलझा रहता है। परंतु जब मन संसार के आकर्षणों से मुक्त होकर प्रभु के चरणों में समर्पित हो जाता है, तब भक्ति का अमृत हृदय में प्रकट होता है और जीवन धन्य हो जाता है। श्रीराम का स्मरण केवल नाम लेने से नहीं, अपितु हृदय की पूर्ण समर्पण भावना से होता है। जैसे पवनपुत्र हनुमान ने अपने प्राणों में श्रीराम को बसाया, वैसे ही भक्त को अपने रोम-रोम में प्रभु का अनुभव करना चाहिए। कहा भी गया है— “रामहि केवल प्रेम पियारा। जानि लेहु जो जाननिहारा॥” अर्थात् श्रीराम को केवल प्रेम ही प्रिय है, यही भक्ति का सर्वोच्च मार्ग है। एक अन्य पावन वचन है— “भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ। याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥” अर्थात श्रद्धा और विश्वास के बिना हृदयस्थ ईश्वर का दर्शन संभव नहीं। चित्रकूट की महिमा का स्मरण करते हुए कहा गया है— “चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसें तिलक देत रघुबीर॥” चित्रकूट वह पावन भूमि है जहाँ श्रीराम का प्रेम, त्याग और तपस्या आज भी भक्तों के हृदय को पुलकित करती है। जो मनुष्य अपने हृदय में प्रेम, संतोष, वैराग्य और समर्पण को धारण करता है, उसके भीतर स्वयं श्रीराम का प्रकाश प्रकट होता है और वही जीवन की परम सिद्धि है।




