संत भगवान रविदास जी महाराज ने सभी को एकता के सूत्र में बंटे हुए मिलजुल कर रहने का संदेश दिया रविदास आचार्य पूर्व विधायक श्री सुरेश राठौर हरिद्वार
वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजमनोजानंद ज्वालापुर संत
हरिद्वार भगवान रविदास जयंती पर अपने श्री मुख से उद्गार व्यक्त करते हुए रविदास आचार्य पूर्व विधायक श्री सुरेश राठौड़ ने कहासंत शिरोमणि भगवान रविदास (रैदास) जी भारतीय आध्यात्मिक क्षितिज के वे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी सरलता, शुचिता और भक्ति से समाज की कुरीतियों पर प्रहार किया। वे न केवल एक संत थे, बल्कि एक महान समाज सुधारक और क्रांतिकारी विचारक भी थे। संत शिरोमणि रविदास: मानवता और आत्मज्ञान के अमर पुरोधा संत रविदास जी का प्रादुर्भाव 15वीं-16वीं शताब्दी (मध्यकाल) के दौरान हुआ। उनका जन्म काशी (वाराणसी) में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था। यह वह समय था जब भारतीय समाज जातिवाद, छुआछूत और आडंबरों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। रविदास आचार्य श्री सुरेश राठौड़ ने कहाऐसे कठिन समय में उन्होंने अपनी वाणी से प्रेम और समानता की गंगा बहाई।आम जनमानस को संदेश: “मन चंगा तो कठौती में गंगा” रविदास जी का सबसे बड़ा संदेश मानवता और कर्म की पवित्रता था। उन्होंने समाज को सिखाया कि ईश्वर किसी विशेष जाति या वर्ग की जागीर नहीं है। समानता का भाव: उन्होंने ‘बेगमपुरा’ (एक ऐसा शहर जहाँ कोई गम न हो) की परकल्पना दी, जहाँ न कोई छोटा हो, न बड़ा, न कोई भेदभाव हो और न ही कोई कर।कर्म ही पूजा: वे जूते बनाने का अपना पैतृक कार्य पूरी निष्ठा से करते थे। उन्होंने सिद्ध किया कि यदि मन पवित्र है, तो ईश्वर आपकेसे कार्यस्थल पर भी प्रकट हो सकते हैं। उनका प्रसिद्ध कथन “मन चंगा तो कठौती में गंगा” आज भी कर्मयोग का सबसे बड़ा मंत्र है।आत्मज्ञान और ईश्वर से साक्षात्कार रविदास जी ने अपने भक्तजनों को ईश्वर से जुड़ने के लिए किसी कठिन कर्मकांड की नहीं, बल्कि ‘सहज भक्ति’ की राह दिखाई। उन्होंने आत्मज्ञान का बोध कुछ इस प्रकार कराया: अद्वैत का बोध: उन्होंने समझाया कि आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। जैसे पानी की लहर पानी से अलग नहीं होती, वैसे ही मनुष्य ईश्वर का ही अंश है। श्री सुरेश राठौड़ जी ने बताया अहंकार का त्याग: उन्होंने सिखाया कि जब तक ‘मैं’ (अहंकार) है, तब तक ‘हरि’ (ईश्वर) नहीं मिल सकते। आत्मज्ञान के लिए विनम्रता अनिवार्य है। प्रेम का मार्ग: उनकी भक्ति में दास्य भाव और प्रेम की प्रधानता थी। उनके पदों में आत्म-समर्पण की पराकाष्ठा दिखती है, जैसा कि उन्होंने लिखा: प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।ज्ञान की अनुभूति का अनूठा तरीका रविदास जी शब्दों से ज्यादा अपने आचरण से ज्ञान देते थे। जब चित्तौड़ की रानी झाली और मीराबाई जैसी विभूतियों ने उन्हें अपना गुरु माना, तो यह इस बात का प्रमाण था कि उनका आत्मज्ञान ऊंच-नीच की सीमाओं को लांघ चुका था। उन्होंने सिखाया कि शरीर नश्वर है, पर इसके भीतर बैठा ‘राम’ (चेतना) शाश्वत है। संत रविदास जी का जीवन हमें सिखाता है कि महानता जन्म से नहीं, बल्कि कर्म और विचारों की शुद्धता से प्राप्त होती है। उन्होंने समाज को वह दृष्टि दी जिससे मनुष्य बाहरी आडंबरों को छोड़कर अपने भीतर के परमात्मा को पहचान सके।




