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भगवान की शरणागत हुए बिना न तो मनुष्य को भक्ति प्राप्त हो सकती है और ना ही उसका मानव जीवन सार्थक हो सकता है महामंडलेश्वर श्याम दास महाराज हरिद्वार

हरिद्वार वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानंद सप्त सरोवर रोड स्थित प्रसिद्ध श्री हनुमान गुफा में अंतर मन के ज्ञान के दीप भक्त जनों मेंउस समय जल उठे गुरु देव प्रातः स्मरणीय अनंत विभूषित महामंडलेश्वर 1008 श्री श्याम दास जी महाराज ने भक्तजनों के बीच सत्संग की गंगा प्रवाहित करते हुए कहा भक्तिपथ की प्राप्ति साधारण विषय नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के अनेक पूर्व जन्मों के संचित कर्मों, प्रारब्ध और ईश्वर की विशेष कृपा का परिणाम मानी गई है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि जिस जीव को भगवद्भक्ति का मार्ग मिलता है, वह यूँ ही नहीं मिलता, अपितु उसके पीछे अनगिनत जन्मों की साधना, पुण्य और ईश्वर की अनुकम्पा निहित होती है। मनुष्य जन्म स्वयं में दुर्लभ है और उस पर भी यदि किसी को भगवान की कथा, नाम और भक्ति का रस प्राप्त हो जाए, तो इसे परम सौभाग्य कहा गया है। भगवान की शरणागति के बिना न तो भाग्य परिवर्तित होता है और न ही भक्ति का उदय संभव होता है। जब तक भगवान श्रीहरि की कृपा दृष्टि जीव पर नहीं पड़ती, तब तक वह संसार के मोह, अहंकार और विषय-वासनाओं में उलझा रहता है। श्रीराम, जो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, अपने भक्तों को धर्म, त्याग और सत्य का मार्ग दिखाते हैं। उनकी शरण में जाने से मनुष्य के जीवन में स्थिरता और शांति आती है, किंतु यह शरणागति भी उन्हीं को प्राप्त होती है जिन पर प्रभु की कृपा पहले से ही होती है। महामंडलेश्वर श्याम दास जी महाराज ने कहा संकट मोचन श्रीहनुमान जी को भक्ति, बल और सेवा का साकार रूप माना गया है। कहा जाता है कि जिन पर वीर बजरंगबली की कृपा होती है, उनके जीवन के बड़े-बड़े संकट भी सहज ही कट जाते हैं। परंतु यह कृपा भी बिना कारण नहीं होती। पूर्व जन्मों के संस्कार, भगवान के प्रति श्रद्धा और निष्काम सेवा की भावना ही हनुमान जी की कृपा को आकर्षित करती है। उनकी इच्छा के बिना मनुष्य का भाग्य बदलना और उसे सच्ची भक्ति की प्राप्ति होना संभव नहीं माना गया है। ईश्वर कर्मफल दाता हैं, किंतु वे केवल दंड देने वाले नहीं, अपितु करुणा के सागर भी हैं। वे जीव के कर्मों के अनुसार ही उसे भक्ति प्रदान करते हैं। जिसने अपने कर्मों से अहंकार, हिंसा और अधर्म को बढ़ाया है, उसे पहले उनके फल भोगने पड़ते हैं, और जिसने पुण्य, सेवा और सदाचार का मार्ग अपनाया है, उसके लिए भक्ति का द्वार सहज ही खुल जाता है। इस प्रकार भक्ति भी ईश्वर की ओर से दिया गया एक दिव्य उपहार है, जिसे मनुष्य अपनी योग्यता से नहीं, बल्कि उनकी कृपा से प्राप्त करता है। अंततः यही कहा जा सकता है कि भागवत पथ पर चलना, भगवान का नाम लेना और उनकी शरण में जाना मनुष्य के प्रयास मात्र से संभव नहीं है। यह सब कुछ पूर्व जन्मों के प्रारब्ध, वर्तमान जीवन के कर्म और ईश्वर की असीम कृपा से ही प्राप्त होता है। जब भगवान चाहते हैं, तभी जीव का हृदय संसार से हटकर भक्ति की ओर मुड़ता है, और तभी उसका जीवन सार्थक होकर मोक्ष की दिशा में अग्रसर होता है।

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