जुना अखाड़े की छड़ी यात्रा देश की खुशहाली सुख शांति समृद्धि के साथ-साथ विश्व कल्याण हेतु समर्पित महामंडलेश्वर संजय गिरी महाराज हरिद्वार

हरिद्वार( वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानंद )
कांगड़ी स्थित श्री प्रेम गिरी बनखंडी धाम में आज भ्रमण के दौरान पहुंची छड़ी यात्रा जूना अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय सभापति परम पूज्य श्री प्रेम गिरि जी महाराज ने कहा छड़ी यात्रा से देवी देवताओं की कृपा बरसती है देश में सुख शांति एवं समृद्धि का वास होता है इस अवसर पर बोलते हुए महामंडलेश्वर वरह्द गिरी महाराज ने कहा छड़ी यात्रा हमारी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति का भाग इस अवसर पर जूना अखाड़े की छड़ी यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर परम पूज्य 1008 महामंडलेश्वर श्री संजय गिरी जी महाराज ने कहा
भारत एक आध्यात्मिक और धार्मिक देश है जहाँ संत–महात्माओं, अखाड़ों और मठों की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इन्हीं में से एक प्रमुख परंपरा है जुना अखाड़े की छड़ी यात्रा, जो धार्मिक आस्था, साधना और परंपरा का अद्वितीय संगम है। यह यात्रा विशेष रूप से कुंभ और अर्धकुंभ के अवसर पर प्रसिद्ध होती है।
जुना अखाड़े का परिचय
जुना अखाड़ा भारत के सबसे प्राचीन, विशाल और प्रभावशाली अखाड़ों में से एक माना जाता है। इसकी स्थापना का श्रेय आदि शंकराचार्य को दिया जाता है, जिन्होंने सनातन धर्म की रक्षा और साधुओं को संगठित करने के लिए अखाड़ों की परंपरा शुरू की थी। जुना अखाड़ा विशेष रूप से अवधूत साधुओं और नागा संन्यासियों के लिए प्रसिद्ध है। इसके लाखों साधु पूरे भारत में धर्म की रक्षा और सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय रहते हैं।
छड़ी यात्रा का महत्व
छड़ी यात्रा जुना अखाड़े की एक विशेष धार्मिक परंपरा है। “छड़ी” यहाँ शक्ति, संकल्प और सन्यास मार्ग की प्रतीक मानी जाती है। यह यात्रा मुख्यतः अखाड़े के महंतों और साधुओं के नेतृत्व में संपन्न होती है। इसमें साधु-संत अपने दंड (छड़ी) और ध्वज के साथ धार्मिक शोभायात्रा निकालते हैं।
यह यात्रा साधुओं की सामूहिक शक्ति और एकजुटता का प्रतीक होती है। छड़ी यात्रा में शामिल साधु–महात्मा नग्न अवस्था में भस्म धारण कर, हाथों में त्रिशूल, तलवार, भाला और डमरू लेकर चलते हैं। उनके जयघोष, वैदिक मंत्रोच्चार और हर–हर महादेव की ध्वनि से वातावरण गूंज उठता है।
इतिहास और उत्पत्ति
छड़ी यात्रा का इतिहास अखाड़ों की स्थापना से जुड़ा हुआ है। मध्यकालीन समय में जब विदेशी आक्रमणकारियों से सनातन धर्म को खतरा था, तब साधुओं को संगठित करने के लिए अखाड़े बनाए गए। साधुओं ने शस्त्र उठाकर धर्म और संस्कृति की रक्षा की। जुना अखाड़ा, जो सबसे पुराना अखाड़ा माना जाता है, ने छड़ी यात्रा की परंपरा शुरू की ताकि साधुओं की सामूहिक शक्ति और संगठन का परिचय कराया जा सके।
समय के साथ यह केवल शौर्य प्रदर्शन ही नहीं रहा, बल्कि एक धार्मिक अनुष्ठान और साधना का अंग बन गया।
यह यात्रा मुख्य रूप से कुंभ और अर्धकुंभ मेले से जुड़ी है। जब भी कुंभ होता है, उससे पहले अखाड़े छड़ी यात्रा निकालकर अपनी आस्था और धार्मिक संकल्प का प्रदर्शन करते हैं।
आधुनिक समय में छड़ी यात्रा
आज भी छड़ी यात्रा उतनी ही आस्था और श्रद्धा से निकाली जाती है। यह यात्रा विशेष सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बीच होती है क्योंकि लाखों श्रद्धालु इसे देखने आते हैं। यह केवल साधुओं का धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उत्सव है जिसमें धर्म, अध्यात्म और भारतीय संस्कृति का अद्वितीय दर्शन होता है।
जुना अखाड़े की छड़ी यात्रा केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि सनातन धर्म की शक्ति, संगठन और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। इसका इतिहास हमें यह सिखाता है कि धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए साधु–संतों ने केवल तपस्या ही नहीं की, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर शस्त्र भी उठाए। छड़ी यात्रा हमें यह संदेश देती है कि शक्ति और भक्ति का संतुलन ही सच्चा धर्म है।



