अष्टमी हमें आत्म बल संयम और समृद्धि प्रदान करती है श्री कृष्ण का जन्म भी अष्टमी के दिन ही हुआ था महामंडलेश्वर श्याम दास महाराज हरिद्वार

हरिद्वार सप्त सरोवर मार्ग स्थित प्रसिद्ध हनुमान गुफा में भक्तजनों के बीच ज्ञान की वर्षा करते हुए परम तपस्वी विद्वान महामंडलेश्वर 1008 श्री श्याम दास जी महाराज ने कहा नवरात्र महापर्व पर अष्टमी का हमारे जीवन में विशेष महत्व है

सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से समृद्ध देश है। यहां प्रत्येक पर्व और त्यौहार किसी न किसी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक संदेश को संजोए हुए होता है। इन्हीं विशेष पर्वों में से एक है अष्टमी तिथि, जो विशेष रूप से शक्ति उपासना और भक्ति साधना के लिए जानी जाती है। चाहे वह दुर्गाष्टमी हो, कृष्ण जन्माष्टमी हो या फिर मासिक अष्टमी उपवास, प्रत्येक का जीवन में अलग-अलग महत्त्व है।

अष्टमी तिथि का धार्मिक महत्त्व

हिन्दू पंचांग में चंद्र मास के शुक्ल व कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को विशेष स्थान प्राप्त है।

शुक्ल पक्ष की अष्टमी पर देवी दुर्गा की पूजा का विशेष महत्व है। इसे दुर्गाष्टमी कहा जाता है।

कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इसे जन्माष्टमी कहा जाता है।

इसके अतिरिक्त मासिक अष्टमी व्रत को भी विशेष फलदायी माना गया है। महामंडलेश्वर श्री श्याम दास जी महाराज ने बताया

 

दुर्गाष्टमी का महत्व

 

नवरात्रि के आठवें दिन माँ महागौरी की उपासना की जाती है।

इस दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व है, जिसमें छोटी-छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। यह तिथि शक्ति, साहस और विजय का प्रतीक मानी जाती है।

 

जन्माष्टमी का महत्व

 

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।

इस दिन व्रत, पूजा, भजन-कीर्तन और झूलनोत्सव का आयोजन किया जाता है।

कृष्ण जन्माष्टमी केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से मानवता को जीवन जीने का मार्ग दिखाया।

अष्टमी व्रत और साधना

 

अष्टमी के दिन व्रत रखने से मन, वचन और कर्म की शुद्धि होती है।

यह तिथि साधना और आत्मसंयम के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है।

अष्टमी उपवास करने से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

 

सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश

 

अष्टमी केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि समाज में नारी शक्ति के सम्मान और धर्म-संरक्षण का भी प्रतीक है।

दुर्गाष्टमी पर कन्या पूजन यह सिखाता है कि नारी केवल पूजनीय ही नहीं, बल्कि जीवन का आधार भी है।

जन्माष्टमी हमें यह शिक्षा देती है कि धर्म की रक्षा के लिए अन्याय और अधर्म का विरोध करना आवश्यक है

अष्टमी तिथि का महत्व बहुआयामी है। यह तिथि हमें भक्ति, शक्ति और धर्म का मार्ग दिखाती है। चाहे वह माँ दुर्गा की आराधना हो या भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव, अष्टमी हमें आत्मबल, संयम, कर्तव्य और न्याय का संदेश देती है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में अष्टमी तिथि का स्थान सदैव सर्वोपरि माना गया है।

Related Articles

Back to top button