धैर्य और भक्ति से किस प्रकार ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है इसकी प्रेरणा माता शबरी के सबर और धैर्य से से मिलती है श्री महंत रघुवीर दास महाराज

हरिद्वार 28 सितंबर 2025 (वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानंद) श्री सुदर्शन आश्रम अखाड़े में भक्तजनों के बीच ज्ञान की गंगा प्रवाहित करते हुए आश्रम के परम तपस्वी ज्ञान मूर्ति श्री महंत रघुवीर दास महाराज ने कहा माता शबरी के सब्र का हमें रामायण से ऐसे चरित्र मिलते हैं, जो हमें भक्ति, श्रद्धा और धैर्य का अद्भुत संदेश देते हैं। उन महान चरित्रों में माता शबरी का नाम अत्यंत आदर और भक्ति से लिया जाता है। उनकी कहानी केवल एक भक्त की कथा नहीं, बल्कि यह प्रमाण है कि भगवान केवल राजमहलों में नहीं, बल्कि सच्चे और निष्कलुष हृदय में वास करते हैं। परम पूज्य ज्ञान मूर्ति श्री महंत रघुवीर दास महाराज ने बताया
शबरी का जन्म भील समाज में हुआ था। उस समय समाज उन्हें ‘अछूत’ मानता था और मंदिरों या धार्मिक कार्यों से दूर रखता था। किंतु शबरी के हृदय में बचपन से ही ईश्वर-भक्ति और साधु-संतों की सेवा की गहरी लालसा थी। विवाह योग्य होने पर जब उनके परिवार ने बलि देकर विवाह संस्कार की तैयारी की, तो शबरी को यह उचित नहीं लगा। उन्होंने मन ही मन प्रण लिया कि वह हिंसा और पाप से दूर रहकर अपना जीवन केवल भगवान की भक्ति में समर्पित करेंगी।
शबरी घर छोड़कर जंगल में चली गईं और अंततः मतंग ऋषि के आश्रम में पहुँचीं। मतंग ऋषि ने उनके शुद्ध हृदय को देखकर उन्हें अपने आश्रम में स्थान दिया। वहाँ शबरी दिन-रात साधुओं की सेवा, आश्रम की सफाई और तपस्वियों के कार्यों में लगी रहती थीं।
समाज ने मतंग ऋषि से बार-बार कहा कि शबरी नीच जाति की है, उसे आश्रम से निकाल दीजिए। लेकिन ऋषि ने उत्तर दिया —
“यह नीच जाति की नहीं, बल्कि महान भक्ति और निर्मल हृदय की स्वामिनी है। इसका स्थान किसी भी साधक से ऊँचा है।”
मतंग ऋषि ने शबरी को यह वरदान दिया कि एक दिन स्वयं भगवान श्रीराम उनके आश्रम में आएँगे और उनके तप, भक्ति और धैर्य का प्रतिफल देंगे।गुरु के वचनों को शबरी ने जीवन का सत्य मान लिया। दिन-रात वे भगवान राम के आने की प्रतीक्षा करतीं।
उन्होंने हर दिन आश्रम को सजाया।
मार्ग की सफाई की।
फूल और जल तैयार रखा।
और सबसे बढ़कर, वे रोज़ फल एकत्र करतीं ताकि भगवान के आने पर उन्हें भोग लगा सकें।
साल दर साल बीत गए। ऋषि का आश्रम वीरान हो गया, ऋषि स्वयं भी लोकांतरित हो गए, लेकिन शबरी का धैर्य कभी नहीं टूटा।
श्रीराम का आगमन
राम-वनवास के दौरान, जब माता सीता का हरण रावण ने किया, तब श्रीराम सीता की खोज में लक्ष्मण सहित दंडकारण्य पहुँचे। उसी समय उनका पथ शबरी के आश्रम की ओर मुड़ा।
भगवान राम को देखते ही शबरी की आँखों से आनंदाश्रु बहने लगे। वे बार-बार चरणों पर गिरकर कहने लगीं —
“प्रभु! मैं नीच जाति की, अज्ञानिनी, निर्बल स्त्री हूँ, फिर भी आप मेरे आश्रम में आए। मेरा जीवन धन्य हो गया।”
शबरी ने प्रेमपूर्वक भगवान को बेर अर्पित किए। वह प्रत्येक बेर को चखकर देखतीं कि यह मीठा है या नहीं। मीठे बेर श्रीराम को देतीं और कच्चे या खट्टे फेंक देतीं।
समाज की दृष्टि से यह ‘जूठे बेर’ थे, किंतु भगवान राम ने बड़े आनंद से उन्हें स्वीकार किया और कहा —
“शबरी! इन बेरों में प्रेम और भक्ति का जो स्वाद है, वह अमृत से भी श्रेष्ठ है।”
भक्ति में जाति-पाति का भेद नहीं — शबरी की कथा इस बात का प्रमाण है कि भगवान के लिए जाति, वर्ण, लिंग या कुल महत्व नहीं रखते।
धैर्य और प्रतीक्षा का महत्व — वर्षों की प्रतीक्षा के बाद शबरी को भगवान के दर्शन मिले। यह दर्शाता है कि भक्ति में धैर्य रखना आवश्यक है।
निष्काम सेवा — शबरी ने बिना किसी प्रतिफल की इच्छा के गुरु और आश्रम की सेवा की। यही सेवा भावना उन्हें ईश्वर तक ले गई।
सच्चे प्रेम की शक्ति — भगवान ने शबरी के बेर स्वीकार करके यह दिखाया कि ईश्वर केवल बाहरी अर्पण नहीं, बल्कि प्रेम और भाव को देखते हैं।
माता शबरी की भक्ति सनातन धर्म में अद्वितीय उदाहरण है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि भक्ति का मार्ग सरल है — श्रद्धा, धैर्य और सच्चा प्रेम। भगवान श्रीराम ने शबरी के जूठे बेर खाकर यह सिद्ध किया कि उनके लिए धन, वैभव और बाहरी दिखावा महत्वहीन है; उन्हें केवल भक्त का हृदय चाहिए।
आज भी जब हम “शबरी के बेर” की कथा सुनते हैं, तो यह हमें याद दिलाती है कि ईश्वर केवल वहीं आते हैं, जहाँ निष्कलुष प्रेम और सच्चा धैर्य होता है।



