श्री महंत रवींद्र पुरी महाराज का जीवन हमारे सामने त्याग एवं समर्पण के लिए प्रेरणादायी सिटी प्रेस क्लब ने की पदम श्री देने की मांग हरिद्वार

हरिद्वार वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोज मनोज मनोजानंद हरिद्वार की पावन और आध्यात्मिक भूमि सदियों से संतों, महात्माओं और तपस्वियों की तपस्थली रही है। गंगा तट पर बसा यह पवित्र नगर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि सेवा, त्याग और मानवता की परंपरा का भी जीवंत उदाहरण है। इस धरती ने अनेक ऐसे संतों को जन्म दिया है जिन्होंने अपनेतप,त्यागऔरलोककल्याणकारी कार्योंसे समाज में एक अमिट छाप छोड़ी है। इन्हीं महान संतों की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले प्रातः स्मरणीय गुरु भगवान श्री महंत रविंद्र पुरी जी महाराज का नाम आज पूरे देश में अत्यंत सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है।श्री महंत रविंद्र पुरी जी महाराज अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष, पंचायती श्री निरंजनी अखाड़े के सचिव तथा मां मनसा देवी ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में लंबे समय से धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उनके व्यक्तित्व में एक सच्चे संत की करुणा, सेवा भावना और कर्तव्यनिष्ठा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वे केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शक ही नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए प्रेरणा और सहारा भी हैं। उनके जीवन का मूल उद्देश्य मानवता की सेवा और समाज के कमजोर तथा जरूरतमंद वर्गों की सहायता करना रहा है।
विशेष रूप से कोरोना महामारी के कठिन समय में उनका सेवा भाव पूरे देश के सामने एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आया। जब संपूर्ण विश्व महामारी के भय और संकट से जूझ रहा था, लाखों लोग रोजगार और भोजन की समस्या से परेशान थे और कई परिवार कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे थे, तब ऐसे समय में श्री महंत रविंद्र पुरी जी महाराज ने अपनी समस्त अर्जित धन-संपदा को समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने प्रतिदिन करोड़ों रुपये की खाद्य सामग्री, दवाइयां और आवश्यक वस्तुएं जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने का अभियान चलाया।
उत्तराखंड के शहरों से लेकर दूरस्थ गांवों तक उनकी सेवा की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दी। कई ऐसे दुर्गम क्षेत्र थे जहां सामान्य वाहनों से पहुंचना तो दूर, पैदल पहुंचना भी अत्यंत कठिन था, लेकिन फिर भी उनकी प्रेरणा और प्रयासों से वहां तक खाद्य सामग्री और सहायता पहुंचाई गई। उत्तराखंड के अलावा देश के अन्य राज्यों में भी उन्होंने जरूरतमंद लोगों को आर्थिक सहायता और खाद्य सामग्री उपलब्ध कराई। उनके इस महान कार्य ने हजारों परिवारों को संकट की घड़ी में सहारा दिया और यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा संत वही होता है जो समाज के दुख-दर्द को अपना समझकर उसकी सेवा करता है।श्री महंत रविंद्र पुरी जी महाराज की एक और विशेषता यह है कि उनके दरवाजे से कोई भी व्यक्ति कभी खाली हाथ नहीं लौटता। जो भी व्यक्ति सहायता, मार्गदर्शन या आशीर्वाद की भावना से उनके पास आता है, उसे सदैव स्नेह, सहयोग और प्रेरणा मिलती है। वे केवल धार्मिक उपदेश देने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि मानवता के हर कठिन समय में लोगों के साथ खड़े होकर उनकी समस्याओं को दूर करने का प्रयास करते हैंसामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक हर क्षेत्र में उनका व्यवहार समान रूप से विनम्र, स्नेहपूर्ण और निष्पक्ष रहता है। वे समाज के हर वर्ग के लोगों के साथ समान भाव से मिलते हैं और सभी के प्रति करुणा तथा सम्मान का भाव रखते हैं। कई बार लोग उनके बारे में भिन्न-भिन्न विचार भी व्यक्त करते हैं, लेकिन उनकी दृष्टि हमेशा सभी के प्रति समान और सकारात्मक बनी रहती है। वे अपने कर्म और सेवा के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि सच्ची संत परंपरा का मूल उद्देश्य समाज को जोड़ना, सेवा करना और मानवता की रक्षा करना है।आज के समय में जब समाज को ऐसे प्रेरणादायक व्यक्तित्वों की आवश्यकता है जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर जनसेवा के लिए कार्य करें, तब श्री महंत रविंद्र पुरी जी महाराज का जीवन एक आदर्श के रूप में हमारे सामने उपस्थित है। उनका त्याग, सेवा और समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि आध्यात्मिकता का वास्तविक अर्थ केवल पूजा और साधना तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवता की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म हैऐसे देवतुल्य, सेवाभावी औरकर्तव्यनिष्ठ संत का सम्मान केवल किसी एक संस्था या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पूरे राष्ट्र को उनके योगदान का सम्मान करना चाहिए। समाज सेवा, मानवता की रक्षा और जरूरतमंदों की सहायता के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए यह पूर्णतः उचित और न्यायसंगत होगा कि भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान से अलंकृत किया जाए।सिटी प्रेस क्लब हरिद्वार इसी भावना के साथ भारत सरकार से यह विनम्र और सशक्त मांग करता है कि श्री महंत रविंद्र पुरी जी महाराज के महान कार्यों और समाज के प्रति उनके अद्वितीय योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी जाए और उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाए। यह सम्मान न केवल एक महान संत के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रतीक होगा, बल्कि समाज में सेवा और मानवता की भावना को भी और अधिक प्रोत्साहित करेगा।

