जितना भक्त भगवान के निकट रहते हैं उतने ही भगवान भी भक्त के निकट रहते हैं श्री महंत कमलेशानन्द सरस्वती हरिद्वार

हरिद्वार वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोज मनोजानंदखड़खड़ी स्थित गंगा भक्ति आश्रम में प्रातः स्मरणीय श्री महंत कमलेशानन्द सरस्वती जी महाराज ने अपने श्री मुख से उद्गार व्यक्त करते हुए कहामनुष्य का मन जितना भगवान के निकट रहेगा और जितना अधिक प्रभु भक्ति में रमा रहेगा, उसका जीवन उतना ही पवित्र, शांत और कल्याणकारी बनता जाएगा। संसार के समस्त सुख क्षणभंगुर हैं, परंतु भगवान का नाम, भजन और भक्ति ही ऐसे अमूल्य साधन हैं जो मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर परम शांति और मोक्ष की प्राप्ति कराते हैं। भगवान श्री हरि और भगवान श्री राम का स्मरण केवल एक साधना नहीं, बल्कि जीवन को सफल और सार्थक बनाने का दिव्य मार्ग है। जब मनुष्य सच्चे भाव, श्रद्धा और समर्पण से प्रभु का भजन करता है, तब उसके अंतःकरण की अशुद्धियाँ दूर होती हैं, मन निर्मल होता है और जीवन में धर्म, प्रेम, दया, क्षमा तथा सत्य का प्रकाश फैलने लगता है। शास्त्रों में कहा गया है— “कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिरि सुमिरि नर उतरहि पारा।” अर्थात इस कलियुग में भगवान के नाम का स्मरण ही वह नौका है जो मनुष्य को भवसागर से पार उतार सकती है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह अपने व्यस्त जीवन में भी कुछ समय प्रभु भक्ति, नामजप और सत्संग के लिए अवश्य निकाले। गुरु के बताए हुए मार्ग पर चलना, उनके उपदेशों का पालन करना और अपने जीवन को धर्ममय बनाना ही सच्ची गुरु भक्ति है, क्योंकि गुरु ही वह दीपक हैं जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं यह दुर्लभ मानव जीवन केवल भोग-विलास के लिए नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और परमात्मा की प्राप्ति के लिए मिला है। यदि मनुष्य इस जीवन को प्रभु स्मरण, सेवा, भक्ति और सत्कर्मों में लगाता है, तो उसका जीवन धन्य हो जाता है और वह लोक तथा परलोक दोनों का कल्याण प्राप्त करता है। आज यही दिव्य और प्रेरणादायक उद्गार गंगा भक्ति आश्रम, खड़खड़ी में श्री महंत परम पूज्य कमलेशानन्द सरस्वती जी महाराज ने भक्तजनों के मध्य व्यक्त करते हुए प्रभु भक्ति, गुरु-सेवा और मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य पर प्रकाश डाला।




