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क्यों करता है तू “मेरा–तेरा”, यह संसार तो चिड़ियों का क्षणभंगुर सा डेरा है। श्री महंत रघुवीर दास महाराज हरिद्वार

हरिद्वार वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोज मनोजानंद सुदर्शन आश्रम अखाड़े मेंप्रातः स्मरणीय गुरु भगवन श्री महंत रघुवीर दास जी महाराज ने हरिद्वार के पावन श्री सुदर्शन आश्रम, रेलवे रोड में अपने श्रीमुख से दिव्य ज्ञान की अमृत वर्षा करते हुए कहा क्यों करता है तेरा मेरा यह दुनिया तो क्षणभंगुर सा चिडियो रेन बसेराकि यह जीवन एक प्रवाह है, एक यात्रा है, जिसमें मनुष्य अनजाने ही मोह, ममता और अहंकार के बंधनों में बंधता चला जाता है। परंतु सत्य यह है कि यह संसार न तो स्थायी है, न ही किसी का अपना—यह तो केवल चिड़ियों की भाँति कुछ समय का विश्राम-स्थल है।जैसे चिड़ियाँ संध्या होते ही वृक्षों पर आकर थोड़ी देर ठहरती हैं और प्रातः होते ही पुनः उड़ जाती हैं, वैसे ही आत्मा भी इस देह रूपी वृक्ष पर कुछ समय के लिए आती है और अपने कर्मों की पूर्ति करके आगे की यात्रा पर निकल जाती है। श्री महंत रघुवीर दास महाराज ने कहा इसी भाव को ऋषियों ने कहा है— “अनित्यं असुखं लोकम् इमं प्राप्य भजस्व माम्।”(भगवद्गीता 9.33)अर्थात यह संसार अनित्य और असुखकारी है, अतः हे जीव, तू मेरा भजन कर।गुरुदेव ने समझाया कि मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा भ्रम “मेरा–तेरा” का भाव है। जब तक यह भाव हृदय में बना रहेगा, तब तक शांति और आनंद दूर ही रहेंगे। यह संसार केवल एक पड़ाव है, और इस पड़ाव पर रुकने वाला कोई भी यात्री स्थायी नहीं होता। चित्रकूट की पावन भूमि का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि जहाँ श्रीराम ने वनवास के समय दिव्य लीला की, वह स्थान भी हमें यह सिखाता है कि संसार से विरक्ति ही वास्तविक शांति का मार्ग है। वहाँ की वायु आज भी यह संदेश देती है “त्यजेत् सर्वमिदं देहं रामनाम परायणः।” (भावार्थ: सब कुछ त्यागकर राम नाम में लीन हो जाना ही सच्चा जीवन है।)गुरुदेव ने आगे कहा कि जीवन का अंतिम सत्य केवल भक्ति है। धन, वैभव, संबंध सब यहीं छूट जाते हैं, परंतु राम नाम ही साथ जाता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह इस अनमोल जीवन में प्रभु स्मरण को ही अपना आधार बनाए।अं त में उन्होंने भावपूर्ण स्वर में कहा “हे मानव! यह जीवन क्षणभंगुर है, इसे व्यर्थ न गंवाओ। भीतर उतरकर देखो, जहाँ राम नाम की ज्योति जल रही है, वहीं तुम्हारा वास्तविक घर है।”

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