राम से बड़ा राम का नाम जो भगवान राम की शरणागत हो जाते हैं वह भवसागर पार हो जाते हैं श्री महंत विष्णु दास महाराज

(वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानंद श्रवण नाथ नगर हिमालय डिपो वाली गली स्थित प्रसिद्ध आश्रम श्री गुरु राम सेवक उछाली आश्रम में अपने श्री मुख से ज्ञान की गंगा बहाते हुए आश्रम के श्री महंत परम तपस्वी ज्ञान मूर्ति प्रातः स्मरणीय विष्णु दास जी महाराज ने कहा भगवान मंदिर में नहीं भक्तों की आस्था में बसते हैं जिसके मन में भगवान राम के प्रति सच्ची आस्था है भगवान सदैव उसके हृदय में वास करते हैं मंदिर तो ईश्वर प्रार्थना का एक स्थान मात्र है भगवान को भक्ति के प्रेम रस से प्राप्त किया जा सकता है और भक्ति कोई ग्रंथ या उपन्यास नहीं है भक्ति तो मां गंगा के आंचल जैसी पावन है किंतु उसका मार्ग हमारे धर्म ग्रंथो से प्राप्त होता है और हमारे गुरु देव के वचनों से प्राप्त होता है सतगुरु देव के चरणों से होकर जाने वाला मार्ग सीधा भवसागर की और जाता है ईश्वर गुरु के रूप में हम लोगों के मार्गदर्शन हेतु हम लोगों के बीच विद्यमान रहते हैं और सतगुरु का पावन सानिध्य और सतगुरु की शरण हमारे जन्मो जन्म के पुण्यों के उदय होने से हमें प्राप्त होती भक्ति मनुष्य के मन का वह भाव है जो ईश्वर के प्रति हमारी आस्था को उजागर करता है भगवान भजन से हमें आत्मिक सुख प्राप्त होने के साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान की अनुभूति भी होती है और साथ-साथ हमारा मानव जीवन सार्थक करने की युक्ति भी प्राप्त हो जाती है युक्ति और मुक्ति दोनों का मार्ग गुरुदेव के श्री चरणों से प्राप्त होता है भरतीय संस्कृति और धर्मग्रंथों में भगवान श्री राम का स्थान सर्वोच्च है। वे केवल अयोध्या के राजा या मर्यादा पुरुषोत्तम ही नहीं, बल्कि सत्य, धर्म और आदर्श जीवन के प्रतीक भी हैं। उनकी भक्ति अनंत है, क्योंकि वह न केवल मर्यादा और नीति से जुड़ी है, बल्कि प्रत्येक भक्त के हृदय में प्रेम और समर्पण की ज्योति प्रज्वलित करती है।
श्री राम की भक्ति हमें यह सिखाती है कि जीवन का सच्चा मार्ग धर्म और सत्य पर चलता है। भक्तों के लिए श्री राम केवल एक देवता नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक, मित्र और परिवार के संरक्षक हैं। उनके चरणों में समर्पण करने से मनुष्य अहंकार, भय और मोह से मुक्त होकर शांति का अनुभव करता है।
हनुमान जी इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं। उन्होंने अपने जीवन का हर क्षण श्री राम की सेवा में अर्पित किया और दुनिया को दिखाया कि सच्ची भक्ति वही है, जिसमें न कोई स्वार्थ हो और न कोई अहंकार। इसी कारण श्रीराम-भक्ति को “अनंत भक्ति” कहा गया है, क्योंकि यह युगों-युगों तक हर जीव के हृदय में प्रवाहित होती रहेगी।
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है कि श्रीराम का नाम ही ऐसा अमृत है जो दुखों को हर लेता है और भक्त को आनंदमय बना देता है। जब भक्त ‘राम’ का स्मरण करता है, तो उसके भीतर एक दिव्य शक्ति का संचार होता है, जो जीवन को धर्ममय और आलोकित बना देती है।
अतः भगवान श्री राम की अनंत भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक शैली है। यह हमें सिखाती है कि कठिनाइयों में भी धर्म का पालन करें, सत्य का साथ न छोड़ें और अपने जीवन को सेवा, प्रेम और करुणा से भर दें।
श्री राम की भक्ति अमर है, असीम है और अनंत है। यह हर युग, हर काल और हर मानव के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। प्रातः स्मरणीय परम तपस्वी ज्ञान मूर्ति परम विद्वान संत श्री महंत 1008 विष्णु दास जी महाराज ने कहा भक्ति ईश्वर प्रेम की गाथा का वह रस है जो मनुष्य के भाग्य का उदय कर देता है और साथ-साथ हमारा मानव जीवन सार्थक कर देता है राम का नाम मनुष्य अच्छे कार्यों में भी सदैव लेता है और जब मनुष्य अंत अंतिम यात्रा पर होता है उस समय भी राम नाम की गाथा उस भवसागर की और धकेल देती है जैसे समुद्र की लहरें छलांगा मार कर काफी दूर चली जाती है इसी प्रकार जीवन की अंतिम यात्रा में राम नाम सत्य है का जाप समुद्र की वही लहरें बनकर उस मनुष्य की आत्मा को भवसागर पार धकेल देती है और वह भगवान श्री हरि की शरणागत हो जाता है राम ही युक्ति राम ही मुक्ति राम सकल संसार रे जीवन का कोई भी छोर हो किंतु जीवन कल्याण सुधा रस जय सियाराम जय जय सियाराम ही है इसीलिए कहते हैं राम से बड़ा राम का नाम जब राम नाम लिखने से पत्थर तैर सकते हैं तो राम नाम की गाथा गाने से यह मानव जीवन भी सार्थक हो सकता है



